महर्षि कण्व वेद विद्याधाम में आपका स्वागत है

 हर्षि कण्व वेद विद्याधाम संस्कृति रक्षा के उद्देश्य से 1 जुलाई २००८ से भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा स्थली उज्जैन के चिंतामन क्षेत्र में स्थित है । वर्तमान समय में संस्कार और संस्कृति की रक्षा परमावश्यक है जिसका प्रवाह यहाँ निरंतर हो रहा है । मूल्यपरक शिक्षा के अंतर्गत प्राकृतिक वातावरण में आधुनिक ज्ञान विज्ञानं के साथ वेद और कर्मकांड की शिक्षा दी जाती है । पूज्य गुरुदेव पं बालकृष्ण जी शास्त्री के पिताजी वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं गणेशदत्त जी शास्त्री ने पूरा जीवन वैदिकों, पुजारियों, कर्मकांडी, ब्राह्मणों के लिए न सिर्फ समर्पित किया अपितु कई भागीरथी प्रयास भी किये थे । उसी परंपरा को संस्थागत रूप पूज्य गुरुदेव पं बालकृष्ण शास्त्री ने दिया है । महर्षि कण्व वेद विद्याधाम न सिर्फ पंजीकृत संस्था है अपितु सांदीपनी राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान से मान्यता प्राप्त है । हमारा उद्देश्य ऐसी शिक्षा प्रणाली का विकास करना है जिससे मूल्यपरक और राष्ट्र भक्ति से ओत प्रोत शिक्षा प्राप्त हो और प्राचीन ज्ञान वेदों का संरक्षण व संवर्धन हो ।

 

             स्मृतियों में चारों आश्रमों के कर्तव्यों का विस्तृत वर्णन मिलता है। मनु ने मानव आयु सामान्यत: एक सौ वर्ष की मानकर उसको चार बराबर भागों में बांटा है। प्रथम चतुर्थांश ब्रह्मचर्य है। इस आश्रम में गुरुकुल में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना कर्तव्य है। इसका मुख्य उद्देश्य विद्या का उपार्जन और व्रत का अनुष्ठान है। मनु ने ब्रह्मचारी के जीवन और उसके कर्तव्यों का वर्णन विस्तार के साथ किया ब्रह्मचर्य, उपनयन संस्कार के साथ प्रारंभ और समावर्तन के साथ समाप्त होता है। इसके पश्चात्‌ विवाह करके मुनष्य दूसरे आश्रम ग्राहस्थ्य में प्रवेश करता है। ग्राहस्थ्य समाज का आधार स्तंभ है। जिस प्रकार वायु के आश्रम से सभी प्राणी जीते हैं उसी प्रकार गृहस्थ आश्रम के सहारे अन्य सभी आश्रम वर्तमान रहते हैं (मनु. ३७७)। इस आश्रम में मनुष्य ऋषिऋण से वेद के स्वाध्याय द्वारा, देवऋण से यज्ञ द्वारा और पितृऋण से संतानोत्पत्ति द्वारा मुक्त होता है।


 

 

 

तपोनिष्ठ वेदमूर्ति  पंडीत गणेशदत्त जी शास्त्री

 

देनिक पंचांग

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